Saturday, February 22, 2014

चाहता हूँ बनना मैं भी एक नारी

पुरुष की  तो सार्थकत है नारी
रवि यदि पुरुष, किरण है नारी
शशि यदि पुरुष,चांदनी है नारी
पवन यदि पुरुष, गति है नारी
नारी करुणा है, सुरभि है, पुष्पा है
यह लेबल नारी पर ही तो चस्पा है
 
मैं भी चाहता हूँ किसी नारी से
थोडी सी रश्मि, बनने के लिए प्रकाश
थोडी सी ज्योति, बनने के लिए प्रभात
थोडी सी अभिलाषा, पाने के लिए गति
थोडी सी चिंता , सवारने के लिए मति
थोडी सी वंदना, छोड़ने के लिए अभिमान
थोड़ी सी पूजा, तोड़ने ले लिए यह मान
थोडा सा त्याग, छोड़ने के लिए दंभ
थोडी सी गति, छोड़ने के लिए जड़ता
थोडी सी ख़ुशी, पाने के लिए प्रसन्नता ...
थोड़ा सा उत्सर्गम करने के लिए उत्कर्ष.


अब क्रूर मर्दानगी नहीं, इंसानियत चाहिए
अब नग्न पौरुष नहीं, मानवता चाहिए
केवल पैसा नहीं, अब तो संवेदना चाहिए
और, और ये ... सभी हैं... स्त्री वाचक
अब समझ में आया हमें ......
पुरुष तो केवल एक ही है- "अकाल पुरुष"
शेष सभी है नारियां ही
चाहे उनका रंग रूप लिंग जो भी हो.
अरे ! औरत श्रेष्ठ है हमसे
वह पहले से ही है, जन्मजात है नारी
मैं तो आज ..पहलीबार बना हूँ.नारी

             - डॉ. जयप्रकाश तिवारी

7 comments:

  1. विद्रोही विचार!! अकाट्य तर्क!! गहरी सम्वेदनाएँ!!

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  2. प्रभावी और नारी मन की दृढ़ता व्यक्त करती रचना ...

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  3. धन्वाद हमेशा की तरह उत्साहवर्धन के लिए.......

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