Friday, September 29, 2017

आत्मा और आत्मस्थ

प्रवचन सुना, जाना मैंने 
पढ़ा शास्त्र तो जाना मैंने 
आत्मा हूँ मैं, काया नहीं, 
ब्रह्म-रूप कोई माया नहीं।  
आत्मा हूँ पर आत्मस्थ नहीं 
तट हूँ पर अभी तटस्थ नहीं ,
कर रहा हूँ खूब मैं भाग दौड़
एक रोगी हूँ मैं, स्वस्थ नहीं।
कहीं बना हुआ नागफनी मैं
कहीं बना हुआ हूँ अमर बेल
घास - फूस सा जीवन मेरा
बन सका कभी अश्वत्थ नहीं। .
मैं नाच रहा एक लट्टू बनकर
अभी उदय हुआ है, अस्त नहीं
निकलूं बाहर, मैं भी यह देखूं 
एक नदी सा हूँ मै, तटस्थ नहीं.
अब होऊं तटस्थ तो बात बने
अभी चंचल हूँ, ध्यानस्थ नहीं
संवेदना बढे तो कुछ बात बने
वेदना बढे... तो कुछ बात बने,
बढ़ गयी है वेदना इतनी अब
कर्मनिष्ठ हुआ, समाधिष्ठ नहीं
ध्यान-ज्ञान विलीन कर्म में
कर्मनिष्ठ हूँ मैं, समाधिष्ट नहीं .
मिट गया भेद तेरे- मेरे का
अज्ञेय नहीं हूँ, ज्ञेय हूँ अब
योगी हूँ और गृहस्थ भी हूँ
आत्मा हूँ और आत्मस्थ भी हूँ.
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Monday, September 4, 2017

शिक्षक दिवस: अपनो से अपनी बात




                                                    
                                                  

५ सितम्बर. आज विश्वप्रसिद्द भारतीय दार्शनिक, महान शिक्षक, गंभीर विचारक और हमारे देश के राष्ट्रपति पद को सुशोभित कर चुके डॉ. राधाकृष्णन की जयंती है, इस दिवस को 'शिक्षक दिवस' के रूप में मनाया जाता है. हमें डॉ. राधाकृष्णन ने शिक्षा और चिंतन का एक आधार, एक दृष्टिकोण प्रदान किया है. आज आवश्यकता है उसे समझने की, वे लिखते हैं - "मनुष्य का विकास खुद-ब-खुद नहीं होता. ऐसी कोई चीज नहीं जोवंशानुक्रम और प्राकृतिक चुनाव के नियमों के अनुसार स्वतः घटित होती हो. मनुष्य का विकास तभी होता है जब वह इसके लिए चौकस होकर कोशिश  करता है. जैसाकि वह है, मनुष्य एक अपूर्ण प्राणी है. उसे अपना पुनः-पुनः संस्कार करना है और पुनः-पुनः विकसित होना है; उसे सार्वभौम जीवन की चेतना-धारा को अपने भीतर से प्रवाहित होने देना है. जिन लोगों ने अपना विकास कर लिया है, जिन्होंने अपने भीतर छिपी संभावनाओं को पहचान लिया है और जिनकी चेतना का पुनर्जन्म हो चुका है, ऐसे ही लोग दूसरों के लिए आदर्श तथा पथ-प्रदर्शक बनते हैं. " इस उद्देश्य की प्राप्ति, यह विकास शिक्षा द्वारा ही संभव है. आज उनकी जयंती पर सबसे अच्छी पुष्पांजलि यह होगी क़ि हम न केवल उनके दिखाए मार्ग का अनुसरण करें अपितु वर्तमान में शिक्षा और शिक्षण की समस्याओं को समझें, उसके निराकरण का प्रयास करें और इस शिक्षक दिवस को सार्थक बनाये. तो आइये प्रारंभ करते है एक विमर्श, अपनों के बीच, शिक्षकों और शिक्षार्थियों के बीच, जन - मानस के बीच..

मित्रों! हमने प्रायः हमेशा ही सुना है - 
शिक्षक, शिक्षा, विद्यार्थी और विद्या को 
शब्दरूप में; परन्तु क्या गुना है - 
इनके अर्थ को, भावार्थ को.., 
शब्दार्थ को, इसके निहितार्थ को ? 
शिक्षक क्या है, हाड - मांस का एक पुतला ? 
या ऐसा कोई व्यक्तित्व जो कक्षा में खड़े-खड़े, 
खींचता रहता है - कोई चित्र, कोई सूत्र, 
काले -चिकने बोर्ड पर; रंग -विरंगे चाक से? 

क्या शिक्षक 
योग्यता रूपी प्रमाण-पत्रों के आधार पर, 
स्वयं अपनी, अपने परिवार का पेट पालने की 
सामाजिक स्वीकृति मात्र है? 
जी नहीं, शिक्षक एक पद है, एक वृत्ति है ; 
संपूर्ण सामाजिक दायित्व का बोध करनी वाला कृति है. 
शिक्षक सांस्कृतिक बोधि और प्राकृतिक चेतना की सम्बोधि है. 
शिक्षक एक माली है, कुम्भकार है, शिल्पकार और कथाकार है 
जो गढ़ता है देश के भविष्य को, सभ्यता और संस्कृति को. 
अरे! वह तो निर्माता है, सर्जक है, नियंता है, 
प्रणेता है - सन्मार्ग का. 
ऐसे शिक्षकवर्ग को, उनकी वृत्ति को, 
उनकी कृति को, उनकी संस्कृति को नमन.
शिक्षा क्या है? 
आजीविका प्राप्त करने का माध्यम? 
या समुन्नत राष्ट्र निर्माण में भागीदारी? 
रचनात्मक भूमिका, सृजनात्मक जिम्मेदारी? 
परन्तु आज शिक्षक रूपी माली, कुम्भकार, 
शिल्पकार और कथाकार, सभी हैरान है, परेशान है. 
वे कहते हैं अपनी पीड़ा - 

'सोचा था यह डाली लाएगी - 
'फूल' और 'फल', फैलाएगी - 'हरियाली'. 
परन्तु हाय! इस डाली से, 
क्यों टपकी यह खून की लाली? 
ये महानुभाव बड़े - बड़े उपाधि धारक हैं, 
परन्तु क्या कहूँ इनकी गति? 
कैसी हो गयी है इनकी मति? 
कभी-कभी तो ये ऐसे कार्य करने में भी नहीं शरमाते 
जिसे कहने में हमें शर्म आती है. 
देखो यह कैसा अनर्थ है? क्या हमारी शिक्षा ही व्यर्थ है? 

मेरे श्रम-परिश्रम में कोई खोट तो नहीं थी मेरे मित्र! 
फिर इस आकर्षक घट में, मृदुल जल की बजाय छिद्र क्यों है? 
और इस नवीन, प्रगतिशील कहे जाने वाले कला-कृतियों में; 
संगीत के स्वरों में, ओज और माधुर्य के स्थान पर, 
नग्नता और विकृति क्यों है? 

कारण है सबका ही एक;  
नहीं किया तूने 'शिक्षा' और 'विद्या' में भेद. 
इसी विद्या के अभाव में, शिक्षा का उत्पाद 
दम्भी अभियंता विकास के नाम पर देश का धन चूसता है, 
डॉक्टर चिकित्सा के नाम पर अभिवावकों का खून चूसता है, 
कुछ लोग संविधान की मर्यादा चूसते है. 

ऐसे में हैरानी क्यों है? 
समझो टहनी में लाली क्यों है? 
तो मेरे भाई! 'विद्या' क्या है ? 
करो विचार, अच्छी लगे तो करो स्वीकार. 

विद्या है - 
मानव को महामानव में रूपान्तारण की तकनीक; 
मानव के अंतर की टिमटिमाती दीप को, 
प्रदीप्त और प्रखर करने की अचूक रीति. 
क्या आज इस बात की आवश्यकता नहीं कि शिक्षा के साथ 
विद्या को भी अनिवार्य रूप में जोड़ दिया जाय? 
शिक्षा ढेर सारी आय का, धनोपार्जन का साधन तो हो सकती है, 
परन्तु; उसके उपयोग - सदुपयोग की कला तो 'विद्या' के ही पास है.

शिक्षा श्रब्यज्ञान है- 
यह पुस्तकीय है, व्याख्यान है, अख्यान है, 
सत्याभास है. यह स्व-प्रधान, काम-प्रधान, 
रागी-विषयी, भोग-प्रधान है. 

विद्या संपूर्ण ज्ञान
स्वानुभूति और आत्मोपलब्धि है; 
तत्व साक्षात्कार है; यह सर्वगत, 
समष्टिगत,समदर्शी, 
तत्वदर्शी, वीतरागी, योग-प्रधान है. 
विद्या लभ्यज्ञान है - स्वानुभूति है, भूमा है, 
नित्य है, सत्य है. इसलिए शिक्षा के उत्पाद को, 
सुख-शांति की सर्वदा तलाश है, 
जबकि 'सुख - शांति - संतोष' तो 
विद्या का स्वाभाविक दास है. 
मेरे मित्र! अब तो ग्रहण करो 'विद्या' को, 
इस तरह खड़ा तू क्यों उदास है? 
यह सतत ध्यान रहे  - 
"यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति", 
(सर्व में ही, पूर्ण में ही सुख है, अल्प में नहीं.) 
अतएव शरणागत हो सदगुरु के जो तेरे ही पास है.

अन्त में एक और प्रश्न, एक समस्या जो शिक्षार्थी और शिक्षक दोनों ही वर्ग उठाते हैं और उनका निहितार्थ भी प्रायः एक ही है - 'असंतुष्टि'.  शिक्षक की शिक्षार्थी से और शिक्षार्थी की शिक्षकों से है - 'असंतुष्टि'. ऐसा ही प्रश्न प्रसिद्द विचारक एवं शिक्षाशास्त्री जे. कृष्णमूर्ति जी से भी पूछा गाया था, उन्होंने जो उत्तर दिया था वह न केवल विचारणीय है बल्कि सामयिक भी. वे कहते हैं - 

"इसका स्पष्ट कारण यह है कि आपके शिक्षक अच्छी तरह पढाना नहीं जानते. इसका कोई गहरा कारण नहीं है, बस यही एक सीधा सा कारण है. आप यह जानते हैं कि जब कोई शिक्षक गणित, इतिहास अथवा अन्य कोई विषय, जिसे वह सचमुच प्रेम करता है, पढ़ाता है तब आप भी उस विषय से प्रेम करने लग जाते हैं; क्योकि प्रेम स्वयं अपनी बात कहता है. क्या आप यह नहीं जानते हैं? जब कोई गायक प्रेम से गाता है तो वह उस संगीत में अपनी समग्रता उड़ेल देता है, तब क्या आप में वही भावना नहीं पैदा होती है? तब क्या आप स्वयं ही संगीत सीखने को नहीं सोचते? परन्तु अधिकाँश शिक्षकअपने विषयों को प्यार ही नहीं करते. विषय उनके लिए बोझ बन जाते हैं; पढ़ना उनकी आदत बन जाती है, जिसके माध्यम से वह अपनी आजीविका कमाते हैं. यदि आपके शिक्षक प्यार से अपना विषय पढाते तो क्या आप जानते हैं कि क्या होता ? तब आप बड़े अद्भुत मानव बनते! तब आप न केवल अपने खेलों और पढ़ाई को ही प्रेम करते अपितु फूलों, सरिताओं, पक्षियों और वसुधा को भी प्रेम करते! तब आप के ह्रदय में सिर्फ प्रेम कि तरंगे होती और इससे सभी चीजें शीघ्रता से सीख पाते! तब आपका मन उदासीनता का माध्यम न होकर एकदम आनंदित होता." आज यह 'प्रश्न' और यह 'उत्तर' दोनों ही अपेक्षाकृत और भी चिंतन - मनन का विषय वस्तु बन गाया है. तो क्या आप तैयार है इसपर विचार-विमर्श के लिए? प्रतीक्षा करूंगा, आपके सुझाव और आलोचना का, समालोचना का.
- Dr. J. P. Tiwari

कविता का जन्म

वेदना के वीर्य से
संवेदना गर्भ मे
पलकर भाव शब्द के
रूप मे सुकोमल
हृदय प्रदेश मे
जन्मती है ‘कविता’

डॉ जयप्रकाश तिवारी

कविता - एक पतंग

वेवेदना 
कविता -
एक पतंग है
भाव गगन मे
हो उन्मुक्त
लहराती है,
मस्ती मे करती है
अठखेलियाँ बलखाती है
अनंतता का करके
संस्पर्श धुन मधुर
गुनगुनाती है,
जीवन राग सुनाती है
प्रगति पथ दिखलाती है।
डॉ जयप्रकाश तिवारीके वीर्य से 
संवेदना गर्भ मे पलकर 
भाव शब्द के रूप मे 
सुकोमल हृदय प्रदेश मे 
जन्मती है – ‘कविता’। -दना के वीर्य से 
संवेदना गर्भ मे पलकर 
भाव शब्द के रूप मे 
सुकोमल हृदय प्रदेश मे 
जन्मती है – ‘कविता’। -

Thursday, August 24, 2017

पत्र पिया के नाम

तुम्ही कहते थे तोता - मैना
सहजा सखाया द्वय सुपर्णा
जब से मुँह थोड़ा मोड़ा तुमने
हो गयी मैं पतझड़, अपर्णा,
मेरे मन के हर एक कोने मे
तुम ही तुम हो अब भी छाये
मन से मेरे जो उठे सब भाव
खुशबू तेरी ही उससे आये,
सारा उल्लास तुम्ही हो मेरी
तुम्ही हो मेरे मन की प्यास।
तुम्ही मेरे मन की हर पीड़ा,
 तुम्ही हो मेरे मन की आस,
बुझ न पाये प्यास ये मन की
रह लूँ मैं चाहे जितनी पास।
तुम नहीं जानते हालत मेरी
तू चाँद मेरा, मैं तेरी चकोरी
क्या तेरी भी दशा यही है?
क्यों आते नहीं हमारे पास?
कब तक रहूँ भाव जगत मे
कब पूरी होगी मेरी आस?
दुनिया हँसती दशा पर मेरे
पूछती वह, तुम क्या गाती?
तू ही हो मेरी गीत और छंद
बचपन से थे, तुम ही पसंद
सब डरा रहे, ऐसा ही होता
प्रेम विवाह सफल कहाँ होता?
हरतालिका निर्जला व्रत हूँ मैं
तन-मन तुम्हें समर्पित आज
रख लो प्रिय मान आज तू मेरी
ना कर फिर आज, मुझे उदास।
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Wednesday, August 23, 2017

स्याही नहीं, आँखों वाला पानी चाहिए

अभी दिल्ली का निर्भया काण्ड, लखनऊ काण्ड भूल भी नहीं पाये थे कि हो गया हरियाणा का ‘वर्णिता काण्ड, बलिया का ‘रागिनी-काण्ड’ और अब लखीमपुर खीरी मे 13 वर्षीय बच्ची के हाथ काटने का वीभत्स और भयानक समाचार।
ओह ! ऐसी दरन्दगी ! यह हैवानियत? इंसानियत का इतना अधः पतन ! इंसान की क्रूरतम करतूत, ये वहसी वासना के ‘क्रूर दूत’ कहाँ से आ टपके हैं आजकल? जब देखो, जहाँ भी देखो, शहर मे, गाँव मे, कभी यहाँ, कभी वहाँ, कभी इस शहर, कभी उस नगर...। न जाने कहाँ से प्रतीक्षित होकर घुस आए हैं ये नर-पिशाच अपने सभ्य, सुसंस्कृत समाज मे? आखिर कौन है इसका जिम्मेदार?
क्या केवल उनकी आलोचना करके, कोसकर, गालियां देकर, मुट्ठियाँ भींचकर, बैनर निकालकर, मोम बत्तियाँ जलाकर या मौन जुलूस निकालकर मुक्त हो सकते हैं हम सब अपने स्वतः स्फूर्त नागरिक होने के अपने सामूहिक दायित्व से? बढ़ती इस निकृष्टतम विकृति, प्रवृत्ति से?
नहीं, कभी नहीं, कहीं से भी नहीं। वासना के ये भूखे भेड़िये पलटे हैं हमारेही घरों मे छुप- छुप के। पाते हैं पनाह हमारे ही आगोश मे। पढ़ते हैं हमारे ही विद्यालय मे, करते हैं कारी हमारे ही कार्यालय मे। कहीं न कहीं पाते हैं सहारा, अवलंबन और मौन प्रोत्साहन भी, हमी, आप से, जाने – अनजाने में। बिना हमारे अवलंबन के कैसे हो सकते हैं ये इतने दु:साहसी? इतने सबल? किसी न किसी रूप मे हमी सब हैं इनका परोक्ष बल।
वासना में आकंठ डूबे पतित इंसान की अंतरात्मा तो कब की मर चुकी होती है, क्या हमारी अन्तरात्मा जीवित है? सभी को एकबार इसपर सोचना होगा। जिसे जहां से भी हो सके, जैसे हो सके ऐसे घिनौनेकृत्य को अब रोकना होगा। यह दुष्प्रवृत्ति रुकनी चाहिए, अभी से, इसी क्षण से। लेकिन यह दुष्प्रवृत्ति रुकेगी कैसे.....? पार्श्व से नीरज ने दिया सुझाव –
“आदमी को आदमी बनाने के लिए /
जिंदगी मे प्यार की कहानी चाहिए /
और कहने के लिए कहानी प्यार की /
स्याही नहीं, आँखों वाला पानी चाहिए” ।
सचमुच सूख सा गया है हमारे नयनों का पानी, सड़कों पर ललचाई सी घूरती रहती है आज कि जवानी। आज की तरुणाई को जगाना होगा, मदहोश है वो, उसे होश मे लाना होगा। इन्हे प्रेम के सात्विक स्वरूप का बोध करना होगा। यह ज़िम्मेदारी, यह दायित्व साझा है, सबका है, यह बीड़ा उथनी होगी, इससे पीठ मोड़ना उचित नहीं।
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Sunday, August 6, 2017

यह भी कोई बात हुई

ये शब्द
जो तुमको ही
हैं समर्पित, 
ये सब कितने
हैं भ्रान्त,
और तुम हो
इतने शान्त?
यह भी
कोई बात हुई?
कितनी मन मे
हलचल आज
गिरी कितनों पर
ये गाज और
तुम शान्त,
यह भी
कोइ बात हुई?
यहाँ मचा
कोलाहल घोर
और कान फाड़ू
ये शोर,
गीदड़ भी नाचे
बन के मोर
फिर भी
तुम इतने शान्त,
यह भी
कोई बात हुई?
यहाँ सबके
मन मे अभिमान
सब भरे हुये
हैं गुमान
ताने हैं
तीर कमान
नहीं है तनिक
उन्हे आराम,
मचा कितना
घनघोर कोहराम,
फिर भी
तुम इतने शान्त?
यह भी
कोई बात हुई?
कर दो
सबको निर्भ्रांत
मिटा दो मिथ्या
सब अभिमान
सब के सब
हों अब शान्त,
अरे ओ प्रभु
तब जा के
लगाओ ध्यान।
चहु ओर शांति,
अब नहीं अशांति,
तुम भी शान्त
और हम भी शान्त,
अब जा के
लगाओ ध्यान
रखो तुम
भक्तों का भी घ्यान,
मिले कुछ उनको
भी शांति सौगात,
पूरी अब जा के हुई
यह बात॥
क्षमा चाहता हूँ
प्रभु तुम से,
न चुभे तुम्हें
कोई मेरी बात॥
और ...
बढ़ता ही रहे
क्रम बातों का
कहीं टूट न जाये
अपनी यह बात।
अब जा के हुई
पूरी कोई बात॥
डॉ जयप्रकाश तिवारी