Tuesday, May 22, 2012

न इतना गम मनाओ तुम!



एक करारी हार पर

न इतना गम मनाओ तुम!

वीर हो, तुम धीर हो

पग दूसरा फिर बढाओ तुम.

त्याग दो इस हार पर

मन में जो भी हो हताशा,

आत्म चिंतन की घडी में

आज कैसी यह निराशा?



इस हार को ठोकर बना लो

दो कदम आगे बढोगे,

मान बैठे फिसलन इसे यदि

कदम चार नीचे गिरोगे.

करती भ्रमित काली जो

बदली, राह में अंधेर बनकर.

लेती हर सारी व्यथा को

ठंडीबूँद की बौछार बन कर.

जीत हो या हार हो

बस दो कदम का फासला है

हार पड़ जाती गले में

पास जिसके हौसला है.

Monday, May 14, 2012


गुरु पूर्णिमा पर्व




जिसने मुझको नाम दिया है,
बहुत बड़ा सम्मान दिया है.
है जो मेरे व्यक्तित्व का सर्जक,
सब कुछ मुझ पर वार दिया है.
उसी का तन मन अर्पित उसको
श्रद्धा सुमन समर्पित है उसको.
ये सब भी, अब कहाँ है मेरा.
सर्वस उसका नहीं कुछ मेरा.

उस सु-नामी का नाम मैं क्यों लूँ?
धो डाला कलुष कषाय जो मैला.
उसे अमूर्त-अनाम-अरूप रहने दो
क्यों करूँ विराट का रूप मैं बौना.

विद्यार्थी, शिष्य और गुरु



विद्यार्थी, शिष्य और गुरु 

हर छात्र जो जाता है विद्यालय
विद्यार्थी वह कहलाता है,
लेकिन सब छात्र नहीं विद्यार्थी
अधिसंख्यक हैं उसमे शिक्षार्थी.

शिक्षार्थी का लक्ष्य जीविकोपार्जन
सुख भोग के खातिर वह पढता है,
विद्यार्थी का लक्ष्य कुछ जानना है
जिज्ञासा शमन को वह पढ़ता है.

जब तीव्र हो उठती जिज्ञासा
अभीप्सा वही तब बन जाती,
धीरे धीरे विद्यार्थी को तब
यही अभीप्सा शिष्य बनाती.

अभीप्सा की प्रगाढ़ता में ही
यह शिष्य भक्त बन जाता है,
जिसे जान गया, पहचान गया
वही होने का उपक्रम करता है.

समर्पण ही तो रूपांतरण है
शिष्य भक्त का, गुरु सत्ता में,
गुरु सत्ता तब विह्वल होकर
निज आसन पर उसे बिठाती.
गुरु मान इस योग्य शिष्य को
अपना शीश चरणों में झुकाती,
यही गुरु-शिष्य की है परंपरा
दीखती कहाँ अब यह परंपरा?

Monday, May 7, 2012

ओ मेरी अपराजिता !

ओ मेरी अपराजिता... !
तू है अगर अपराजिता,
तो रहेगी तू अपराजिता.
मैंने कब चाहा,
तुझे करना पराजित?

हार की यह हार 
है तुझे सादर समर्पित,
हार पहनोगी तुम,
है मेरी भी यही जिद.
देखा होगा तुमने
बहत से जिद्दियों को.
दीवानगी की
जिद भी देखी कभी?

जिंदगी गिरवी मेरी
यह जिद के नाम.
देखता हूँ कौन देता 
है मेरा अब साथ?
तू अगर आयी तो 
दूंगा तुझे फिर से जिता.
ओ मेरी अपराजिता.... ! 
ओ मेरी अपराजिता.... ! 

थी कल भी तू अपराजिता
हो आज भी अपराजिता.
रहोगी कल भी तू अपराजिता.
ओ मेरी अपराजिता.... ! 
ओ मेरी अपराजिता..... ! 

Monday, April 30, 2012

गीतामृत अर्जुन को ही क्यों?




युद्धिष्ठिर तो धर्म धुरंधर थे
गदाधर भीम थे बलशाली,
पर गीताज्ञान अर्जुन को क्यों
पूछे यह प्रश्न मन का माली.

ज्ञान उसी को मिलता है
जो होता है, उसका अधिकारी,
उसको भी सहज ही मिल जाता
जो 'वरण' यथेष्ट को करता है.

कन्या करती वरण है वर को
करता है शिष्य गुरु को वरण,
वारनेय अपना धर्म निभाता
देता है उसको उर में शरण.

योगी पाते जिसे कठिन योग से
तपसी जिसे कठिन तपस्या से,
पाता जिसे पुरुषार्थी कर्मयोग से
शरणागत पाता उसे वरेण्यं से.

अर्जुन ने मान श्रुति का निर्देश
किया था वरण, सखा कृष्ण को
ठुकराके धनबल जनबल सैन्यबल 
वारनेय धर्म ही हुआ प्रस्फुटित 
रणक्षेत्र मध्य वहाँ, कुरुक्षेत्र के.     


Friday, April 27, 2012

बात अब कविता की


कविता की 
बात अब मत पूछ यार!
वह है सम्पूर्ण जीवन व्यापार.
जिसने सुनी नहीं, पढ़ी नहीं
लिखी नहीं कोई कविता.
समझो बही ही नहीं उसके
जीवन में रस की कोई धार.
सुखट्टू ..और निखट्टू ..
है वह, केवल जीता है,
क्योकि जीना है उसे.
मरना वह जनता ही नहीं.
और जो मरना नहीं जनता,
वह जीना क्या खाक जानेगा?

यह जीवन 
तो कविता नहीं, 
जीवन तो है क्षणभर का.
कविता मगर नहीं क्षणिका .
जी ले जीवन जो क्षण भर ही 
जीवन उसका समझो कविता.

कविता 
तो शब्द सरिता है जो 
स्रोत से फूट कर बहती है.
जिसमे शब्द ध्वनि उछलती है
कूदती है, फुदकती है, डूबती है
तैरती है...फूटती है..पुनः पुनः
उगती.बनती और .रंग बदलती है....

कविता,

शब्दों में ही नहीं बहती
संकेतों में ही नहीं झरती
बादलों में ही नहीं कड़कती.
मेघों से ही नहीं बरसात.
भाव- स्वभाव में भी बहती है.
जीवन में हर रंग घोलती है.

कविता,
अश्रु जल से यदि 
मित्रता के पाँव पखारती है 
मित्रभाव शिखर तक पहुचती है
तो नयनों की धार में
इस धरा को डुबोती भी है.
अन्त नहीं इस कविता की 
ऊंचाई और गहराई का.


कविता,
संकेत प्रतीकों में भी बहती है,
झरना प्रपात सा उछलती कूदती है.
और सबसे प्यारी कविता तो वह है
जो प्रेषक और संग्राहक के बीच.
संकेत और मौन में बहती है.
संकेतात्मक कविता जीवन की सौगात
सुना नहीं है?  क्या पता नहीं है ?
'भरे भवन में करत हैं नैनं ही सो बात'.

कविता 
कोई विकार नहीं
मानसिक तरंगों का आकार है. 
ध्वनि ऊर्जा से भाव ऊर्जा तक
आसानी से पहुचती है और
बड़ी प्रबलता से अपनी बात कहती है.

कविता है 
वीरांगना, चंडी रणचंडी 
जो जगाती है -
जोश शौर्य साहस सत्साहस.
शत्रु दमन तो सरल है, 
शस्त्र भी कर सकता है यह.
परन्तु कविता शत्रुता 
और दुश्मनी मिटती है.
शत्रु को भी मित्र बनाती है.
कवता सिखाती है जीने की 
कला, और मरने का ढंग.

कविता, 
केवल कागजों डायरियों और 
कनवास पर ही नहीं लिखी जाती.
य्ह्पूरी प्रकृति एक काव्य है.
आकाश धरती चाँद सितारे
उपवन खिलते फूल ये सारे
इन्द्र धनुष पतझड़ बसंत
शीत ग्रीष्म ये रूप अनंत.
ये एक-एक सर्ग, अध्याय हैं
इस प्रकृति महाकाव्य के.

कविता,
लय राग और छंद की भूखी नहीं.
इसलिए प्रत्येक संवेदी व्यक्ति
एक मन पसंद कविता गुनगुनाता है.
कुशल गायक भले संतुष्ट न कर सके उसे.
लेकिन स्व-गायन संतुष्ट कर जाता है.
अपनी उलझनों का समाधान
वह इस कविता में ही पा जाता है,'




 .

Thursday, April 26, 2012

हाँ, सो रहा था मैं


कहते हो प्यारे!
तो मान लेता हूँ,
हाँ, सो रहा था मैं.
चहरे पर देखा होगा 
रंग तूने हास का.
मगर तुझे क्या पता?
तब रो रहा था मैं.
हास के दर्द को
तब ढो रहा था मैं.

हर बार आंसू गिरना ही 
रोना नहीं होता.
हर हास भी ख़ुशी का 
प्रतीक नहीं होता.
जैसे हर आंसू भी 
दुःख में सना नहीं होता.
आंसू हर्ष - उल्लास के 
अतिरेक में भी बहते हैं.
शबनम के मोती झरते है.
क्या रोना.. 
उसे तब भी कहते हैं.?

हाँ, सो रहा था मैं..
लेकिन खुले हुए थे नैन.
खुले हुय्र थे बैन,
खुला हुआ था कान.
सोया था या जगा हुआ, 
अब तू ही इसे पहचान.

कुछ जप रहा था, 
कुछ तप रहा था.
क्योकि 
पलायन वादी नहीं,
समाज का रोगी हूँ.
क्या करूँ भोगी नहीं
कर्मठ योगी हूँ.

जब देखती दुनिया 
वाह्य जगत को,
योगी अन्तः जगत 
को देखता.
जब सारी दुनिया 
नींद में होती
योगी दुनिया की 
गति देखता.

                          जय प्रकाश तिवारी
                             26 - 04- 2012